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Monday, March 8, 2021

Women’s Day स्पेशल । जाने इसका इतिहास और कुछ अनोखी बातें ।

Women’s Day स्पेशल । 
जाने इसका इतिहास और कुछ अनोखी बातें ।
International Women's Day का 111 साल पुराना इतिहास रहा है. इसकी पहली झलक 1909 में देखने को मिली थी, जब न्यूयॉर्क में करीब 15 से 16 हजार महिलाएं सड़क अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतर गई थीं.

दुनिया भर में हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. 8 मार्च का दिन पूरे विश्व में महिलाओं की उपलब्धियों का सम्मान करने के लिए समर्पित है, खासतौर पर अलग-अलग संस्कृति से ताल्लुक रखने वाली उन महिलाओं के लिए जिन्होंने लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों के लिए हमेशा आवाज उठाई है. 

क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस? 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा दिए गए उनके योगदान के लिए समर्पित है. यह विशेष दिन लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करता है. साथ ही यह रिसर्चर्स को ये समझाने में मदद करता है कि विशिष्ट क्षेत्रों में समाज कैसे प्रगति कर रहा है, कैसे आगे बढ़ रहा है और इसमें महिलाओं का क्या योगदान है? 

भले ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के खास मौके पर ऐसा माना जाता हो कि महिलाएं कितना आगे निकल गई हैं, लेकिन समाज के कई ऐसे मुद्दे हैं जिनका सुलझना अभी बाकी है. इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि महिलाओं ने कैसे अपने अधिकारों के लिए एकता दिखाते हुए एक बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया था. 

8 मार्च को ही क्यों मनाते हैं? 

1909 में महिलाओं की मांग थी कि नौकरी करने के घंटे कम किए जाएं और अच्छा वेतन दिया जाए. इतना ही नहीं इन महिलाओं ने वोट करने का अधिकार देने की मांग भी रखी थी. इन महिलाओं की मांगों को माना गया, जिसके एक साल बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने उनके संघर्ष की शुरुआत करने वाले दिन को राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया. 

असल में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का आइडिया क्लारा जेटकिन ने दिया था, जो कि एक मार्क्सवादी और सामाजिक कार्यकर्ता थीं. क्लारा महिलाओं के हक के लिए हमेशा आवाज उठातीं और उनके अधिकारों के लिए सक्रिय रहती थीं. 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में सभी वर्किंग वुमेन की कांफ्रेंस हुई थी. इस कांफ्रेंस में 17 देशों की 100 महिलाओं ने हिस्सा लिया था. 

महिलाओं के हड़ताल के कारण निकोलस की कुर्सी गयी

कांफ्रेंस के दौरान क्लारा ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का सुझाव दिया, जो कि सभी को पसंद आया. साल 1911 में सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया, लेकिन उस समय इसकी कोई तारीख तय नहीं हुई थी. 

साल 1917 में रूस की महिलाओं ने बोलेशेविक क्रांति के समय वहां के सम्राट निकोलस के सामने ब्रेड एंड पीस की मांग की. अपनी मांगों को लेकर महिलाएं हड़ताल पर बैठ गई थीं. निकोलस ने महिलाओं की हड़ताल तुड़वाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह नाकाम रहा और बाद में उसे मजबूरन अपना पद छोड़ना पड़ा. इसके बाद रूस की अंतरिम सरकार ने महिलाओं की मांग को माना और साथ ही उन्हें वोट करने का अधिकार भी दिया. 

यह वो दौर था जब रूसी लोग जूलियन कैलेंडर का इस्तेमाल करते थे. महिलाओं ने अपनी हड़ताल जब शुरू की थी, तब 23 फरवरी थी, लेकिन ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार, यह दिन 8 मार्च पड़ता है. रूसी महिलाओं की एकता में वो ताकत थी कि उन्होंने निकोलस को गद्दी छोड़ने पर मजबूर कर दिया. 8 मार्च को रूस में आधिकारिक छुट्टी घोषित की गई और फिर बाद में इसी दिन को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के लिए दर्ज कर लिया गया. 

एक ऐसा क्षेत्र, जहां महिलाएं सशक्तिकरण की राह पर हैं और अपने पक्ष की मजबूत दावेदारी दिखा रही हैं। यह क्षेत्र है देश की सुरक्षा। देश की सुरक्षा सबसे अहम होती है, तो इस क्षेत्र में आखिर महिलाओं की भागीदारी को कम क्यूं आंका जाए। देश की मिसाइल सुरक्षा की कड़ी में 5000 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली अग्नि-5 मिसाइल की जिस महिला ने सफल परीक्षण कर पूरे विश्व मानचित्र पर भारत का नाम रौशन किया है, वह शख्सियत हैं टेसी थॉमस। 

डॉ. टेसी थॉमस को कुछ लोग ‘मिसाइल वूमन’ कहते हैं, तो कई उन्हें ‘अग्नि-पुत्री’ का खिताब देते हैं। पिछले 20 सालों से टेसी थॉमस इस क्षेत्र में मजबूती से जुड़ी हुई हैं। टेसी थॉमस पहली भारतीय महिला हैं, जो देश की मिसाइल प्रोजेक्ट को संभाल रही हैं। टेसी थॉमस ने इस कामयाबी को यूं ही नहीं हासिल किया, बल्कि इसके लिए उन्होंने जीवन में कई उतार-चढ़ाव का सामना भी करना पड़ा। आमतौर पर रणनीतिक हथियारों और परमाणु क्षमता वाले मिसाइल के क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व रहा है। इस धारणा को तोड़कर डॉ. टेसी थॉमस ने सच कर दिखाया कि कुछ उड़ान हौसले के पंखों से भी उड़ी जाती। 

डॉ. किरण बेदी भारतीय पुलिस सेवा की प्रथम वरिष्ठ महिला अधिकारी हैं। उन्होंने विभिन्न पदों पर रहते हुए अपनी कार्य-कुशलता का परिचय दिया है। वे संयुक्त आयुक्त पुलिस प्रशिक्षण तथा दिल्ली पुलिस स्पेशल आयुक्त (खुफिया) के पद पर कार्य कर चुकी हैं। ‘द ट्रिब्यून’ के पाठकों ने उन्हें ‘वर्ष की सर्वश्रेष्ठ महिला’ चुना। उनके मानवीय एवं निडर दृष्टिकोण ने पुलिस कार्यप्रणाली एवं जेल सुधारों के लिए अनेक आधुनिक आयाम जुटाने में महत्वपूर्ण योगदान किया है। 

निःस्वार्थ कर्तव्यपरायणता के लिए उन्हें शौर्य पुरस्कार मिलने के अलावा उनके अनेक कार्यों को सारी दुनिया में मान्यता मिली है, जिसके परिणामस्वरूप एशिया का नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला रमन मैगसेसे पुरस्कार से उन्हें नवाजा गया। व्यावसायिक योगदान के अलावा उनके द्वारा दो स्वयं सेवी संस्थाओं की स्थापना तथा पर्यवेक्षण किया जा रहा है। ये संस्स्थाएं हैं- 1988 में स्थापित नव ज्योति एवं 1994 में स्थापित इंडिया विजन फाउंडेशन। ये संस्थाएं रोजना हजारों गरीब बेसहारा बच्चों तक पहुँचकर उन्हें प्राथमिक शिक्षा तथा स्त्रियों को प्रौढ़ शिक्षा उपलब्ध कराती है। 

भारतीय ट्रैक ऍण्ड फ़ील्ड की रानी” माने जानी वाली पी॰ टी॰ उषा भारतीय खेलकूद में 1979 से हैं। वे भारत के अब तक के सबसे अच्छे खिलाड़ियों में से हैं। उन्हें “पय्योली एक्स्प्रेस” नामक उपनाम दिया गया था। 1983 में सियोल में हुए दसवें एशियाई खेलों में दौड़ कूद में, पी॰ टी॰ उषा ने 4 स्वर्ण व 1 रजत पदक जीते। 

वे जितनी भी दौड़ों में हिस्सा लीं, सबमें नए एशियाई खेल कीर्तिमान स्थापित किए। 1985 में जकार्ता में हुई एशियाई दौड-कूद प्रतियोगिता में उन्होंने पाँच स्वर्ण पदक जीते। एक ही अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में छः स्वर्ण जीतना भी एक कीर्तिमान है। ऊषा ने अब तक 101 अतर्राष्ट्रीय पदक जीते हैं। वे दक्षिण रेलवे में अधिकारी पद पर कार्यरत हैं। 1985 में उन्हें पद्म श्री व अर्जुन पुरस्कार दिया गया। 

एक भारतीय महिला मुक्केबाज हैं, मैरी कॉम पांच बार ‍विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता की विजेता रह चुकी हैं। दो वर्ष के अध्ययन प्रोत्साहन अवकाश के बाद उन्होंने वापसी करके लगातार चौथी बार विश्व गैर-व्यावसायिक बॉक्सिंग में स्वर्ण जीता। उनकी इस उपलब्धि से प्रभावित होकर एआइबीए ने उन्हें मॅग्नीफ़िसेन्ट मैरी (प्रतापी मैरी) का संबोधन दिया। वह 2012 के लंदन ओलम्पिक मे महिला मुक्केबाजी मे भारत की तरफ से जाने वाली एकमात्र महिला थीं। 



मैरी कॉम ने सन् 2001 में प्रथम बार नेशनल वुमन्स बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीती। अब तक वह छह राष्ट्रीय खिताब जीत चुकी है। बॉक्सिंग में देश का नाम रौशन करने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2003 में उन्हे अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया एवं वर्ष 2006 में उन्हे पद्मश्री से सम्मानित किया गया। जुलाई 29, 2009 को वे भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के लिए (मुक्केबाज विजेंदर कुमार तथा पहलवान सुशील कुमार के साथ) चुनीं गयीं। सायना नेहवाल, सानिया मिर्जा जैसी कई महिलाएं खेल जगत की गौरवपूर्ण पहचान हैं। 1984- बछेन्द्री पाल दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह करने वाली पहली भारतीय महिला हैं। 

मेरी क्युरी विख्यात भौतिकविद और रसायनशास्त्री थी। मेरी ने रेडियम की खोज की थी। विज्ञान की दो शाखाओं (भौतिकी एवं रसायन विज्ञान) में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वह पहली वैज्ञानिक हैं। वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। बडी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। 

ब्रिटिश संसद में महिलाओं को भाग लेने का अधिकार नही था। 1911 में महिलाओं के अधिकार के लिये लङने वाली वीर नारी नेन्सी एस्टर, ब्रिटिश संसद की पहली महिला सासंद बनी। विश्व के राजनीतिक पटल पर आज अनेक देशों के सर्वोच्च पद पर महिलाओं का वर्चस्व है। श्रीलंका की प्रधानमंत्री श्रीमावो भंडार नायके विश्व की प्रथम महिला राष्ट्रपति निर्वाचित हुई। 

विश्वराजनीति के पटल पर पहली महिला राष्ट्रपति का गौरव फिलीपीन्स की मारिया कोराजोन एक्यीनो को जाता है। रजीया सुल्तान हो या बेनीजीर भुट्टो या बेगम खालिदा जिया जैसी कई साहसी मुस्लिम महिलाओं ने भी राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। भारत जैसे शक्तिशाली देश की कमान इंदिरा गाँधी, प्रतिभा सिंह पाटिल द्वारा संचालित की जा चुकी है। लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार एवं अनेक राज्यों की महिला मुख्यमंत्री आज भी अपने कार्य को सफलता पूर्वक अंजाम दे रहीं हैं। अभी हाल ही में एशिया की चौथी सबसे बङी अर्थव्वस्था की नेता पार्क ग्यून हेई ने दक्षिण कोरिया की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेकर नारी वर्ग के गौरव को और आगे बढाया है। 

साहित्य जगत में भी महिलाओं का अभूतपूर्व योगदान रहा है। हिंदी साहित्य में ऐसी गंभीर लेखिकाओं की कमी नही है जिन्होने अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करके विस्तृत साहित्य का सृजन किया है। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, महाश्वेता देवी, आशापूर्णा देवी, मैत्रिय पुष्पा जैसी अनेक महिलाओं ने असमान्य परिस्थितियों में भी साहित्य जगत को उत्कृष्ट रचनाओं से शुशोभित किया है। 18 फरवरी, 1931 को अमेरिका में जन्मी टोनी मोरीसन का नाम विश्व साहित्य में काफी जाना-माना नाम है। नोबेल सम्मान से सम्मानित टोनी ने साहित्य के जरिये अफ्रीकी अमेरिकी अश्वेत औरतों को खास पहचान दिलाने का काम किया है। 

भगनी निवेदिता, मदर टेरेसा या रमाबाई, करुणा और वात्सल्य की भावना से ओतप्रोत महिलाओं ने सामाजिक क्षेत्र की भूमिका को बहुत ही आत्मिय तरीके से निभाया है। उनकी राह पर चलकर आज भी अनेक महिलाएं समाज सुधार के लिये तत्पर हैं। 

एनी बेसंन्ट ने कहा है कि- 

स्त्रियाँ ही हैं, जो लोगों की अच्छी सेवा कर सकती हैं, दूसरों की भरपूर मदद कर सकती हैं। जिंदगी को अच्छी तरह प्यार कर सकती हैं और मृत्यु को गरिमा प्रदान कर सकती हैं। 

आज नारी ट्रेन और हवाई जहाज को भी सफलता पूर्वक चला रही है, बल्की अंतिरक्ष में भी नये कीर्तिमान बना रही है। भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला अंतरिक्ष पटल की खास पहचान हैं। प्रथम महिला रेलगाङी ड्राइवर सुरेखा यादव, जो कि भारत की ही नही वरन एशिया की भी पहली महिला ड्राइवर हैं। 

आज नारी अपने साहस के बल पर पूरे आत्मविश्वास के साथ हर क्षेत्र में कामयाबी का परचम लहरा रही है। सिनेमा जगत को नये रंगो से भर रही हैं। लाइट, कैमरा. एक्शन बोलती महिलायें अपने कदमों के निशान छोङ रही हैं और सामने ला रही हैं एक नया सिनेमा। निर्देशन का जिक्र हो तो सांई परांजपे का नाम जहन में आ जाता है, जिनके निर्देशन में बनी फिल्म जादू का शंख, स्पर्श, चश्मेंबद्दूर, कथा जैसी फिल्मों ने सिने जगत को एक नई पहचान दी। 1996 में संई परांजपे को पद्मभूषण से नवाजा गया। अपर्णा सेन, फराह खान, सरोज खान, नेहा पार्ती जैसी कई महिलाएं सीने जगत में कुछ अलग हट के काम कर रही हैं। 

पंचायती राज में आरक्षण के कारण आज बङी संख्या में गाँव की महिलाएं चुनाव जीत कर जनप्रतिनिधी के रूप में नेतृत्व की कमान संभाल रही हैं। मूक दर्शक बने पंचायत की कारवाई देखना अब बीती बात हो गई है। महिला सरपंचो द्वारा किये गये पंचायतो के कार्यों की चर्चा दूर-दूर तक हो रही है। शमा खान, गीता बाई जैसी अनेक महिला सरपंचो ने नारी के गौरव को बढाया है। सिरोही जीले की निचलागढ ग्राम पंचायत की सरपंच सरमी बाई के कार्यों की सराहना अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कर चुके हैं। भारत की रीढ कही जाने वाली अर्थव्यवस्था, खेती किसानी में भी रामरती जैसी महिलाएं महत्वपूर्ण योगदान दे रहीं हैं। महिलाओं की जागृति और आत्म विश्वास से निश्चित रूप से गाँवों की तस्वीर और तकदीर दोनो ही बदल जायेगी। 

नई सदी की नारी के पास कामयाबी के उच्चतम शिखर को छूने की अपार क्षमता है। उसके पास अनगिनत अवसर भी हैं। जिंदगी जीने का जज्बा उसमें पैदा हो चुका है। दृढ़ इच्छाशक्ति एवं शिक्षा ने नारी मन को उच्च आकांक्षाएँ, सपनों के सप्तरंग एवं अंतर्मन की परतों को खोलने की नई राह दी है।

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